मेरी हमेशा से कोशिश रही है की मै उन मुद्दों पर लिखूँ, जो समय,समाज और संस्कृति की माँग हो,आज जिस मुद्दें पर मै आपसे बात करना चाहता हूँ, वो एक ऐसा विषय है,जो हम सभी को कटघरे मे खड़ा करता है,हम सभी ने इस सच से कभी ना कभी तो मुँह छिपाया होंगा, क्यो की आज देश मे एक ऐसी परम्परा बन गईं है। जो ये कहने वालों की एक बड़ी भीड़ को ये कहते हूँ, एक तरफ कर देती है की "जो ये कह कर अपना पल्ला झाड़ लेती है की ये मेरी जिम्मेदारी नही है" या "इस मामले मे मै क्या कर सकता हूँ " इस सोच ने जहाँ असमाजिक तत्वों के हौसले बुलंद किये,वही दुसरी ओर राजनेताओं को निरंकुश कर दिया। क्योकी मेरे महान भारत मे लोग असहमत होकर भी मौन रहेंगे पर सवाल नही करेगें। यह जानतें हुए की यह गलत हो रहा है, विरोध करने का हौसला नही जुटा पायेंगे, राजनीतिक,समाजिक और धार्मिक मुद्दों की आड़ मे कुछ मुट्ठी भर लोग सत्ता हासिल कर ले,शहर जला दे या नफरत के सहारे वो कुछ भी कर दे पर हम तो मूक दर्शक बने रहेंगे,क्यो एक रंगमंच की स्टेज पर किरदार निभाने की क्षमता से हम भाग गये है,हम सिर्फ तमाशा देख तालियां बजायेंगे आखिर कब तक हम ...