आखिर कब तक हम पीछे चलने वाली भीड़ का हिस्सा रहेंगे?

 मेरी हमेशा से कोशिश रही है की मै उन मुद्दों पर लिखूँ, जो समय,समाज और संस्कृति की माँग हो,आज जिस मुद्दें पर मै आपसे बात करना चाहता हूँ, वो एक ऐसा विषय है,जो हम सभी को कटघरे मे खड़ा करता है,हम सभी ने इस सच से कभी ना कभी तो मुँह छिपाया होंगा, क्यो की आज देश मे एक ऐसी परम्परा बन गईं है।

जो ये कहने वालों की एक बड़ी भीड़ को ये कहते हूँ, एक तरफ कर देती है की "जो ये कह कर अपना पल्ला झाड़ लेती है की ये मेरी जिम्मेदारी नही है" या "इस मामले मे मै क्या कर सकता हूँ "
 इस सोच ने जहाँ असमाजिक तत्वों के हौसले बुलंद किये,वही दुसरी ओर राजनेताओं को निरंकुश कर दिया।
क्योकी मेरे महान भारत मे लोग असहमत होकर भी मौन रहेंगे पर सवाल नही करेगें।
यह जानतें हुए की यह गलत हो रहा है, विरोध करने का हौसला नही जुटा पायेंगे, राजनीतिक,समाजिक और धार्मिक मुद्दों की आड़ मे कुछ मुट्ठी भर लोग सत्ता हासिल कर ले,शहर जला दे या नफरत के सहारे वो कुछ भी कर दे पर हम तो मूक दर्शक बने रहेंगे,क्यो एक रंगमंच की स्टेज पर किरदार निभाने की क्षमता
से हम भाग गये है,हम सिर्फ तमाशा देख तालियां बजायेंगे

आखिर कब तक हम पीछे चलने वाली भीड़ का हिस्सा रहेंगे समय बदला चाहता और बदलाव सरकार, दल या धर्म के तथाकथित ठेकेदार या धर्ममिश्रित राष्ट्रवादी दक्षिणपंथी नही देंगे। बदलाव की क्रांति की चाबी समाज के पास है।
आज कर जरूरत है तो इस बात की हम इस सच को स्वीकार करें की मुझें जिम्मेदार बन कर समाज,शहर,राज्य,राष्ट्र और विश्व के बारे मे सोंचना होगा।बदलाव की लहर आपके और मेरे दरवाज़े से निकल कर विश्वभर मे जायेगी,शांति स्वच्छता, सदभाव,समानता,रोजगार और आर्थिक सबलता आयेंगी।सत्तारूढ़ और विपक्ष की राजनीति से उपर सोचने का अब वक्त है।मैने पिछले कुछ सालों मे कुछ लेख लिखे थें,जो समय के साथ अक्षरशः सही ठहरे,मै अपने आपको कोई बड़ा लेखक नही मानता हूँ ।फिर भी भारत को मै इस लेख के माध्यम से सचेत करना चाहता हूँ अगर देश का नागरिक अपनी समाजिक जिम्मेदारी और हिस्सेदारी से मुँह फेरते या मूक दर्शक बनता तब समाज,देश और सत्ता हमेशा निरंकुश तन्त्र के कब्जे मे आती है।वक्त रहते हमे जागरूक हो अपने देश को धर्म,तथाकथित वाद व मौकापरस्त, फिरकापरस्त लोगों से बचाना होगा।


हम एक समाजिक प्राणी, आस्था हमारी एक निजी भावना उसे हम कैसे समाजिक व राष्ट्रीय मूल्यों का आधार बनाने की बात कर सकतें है।मानवीय मूल्यों धार्मिक आस्था के मूल्यों से शायद मेल खा भी जायें पर समाजिक मानवीय मूल्यों का अपना एक अलग अस्तित्व है।आज समय की माँग है अगर समाज को विखण्डित होने से बचाना है तो जागों और समाज,राज्य,राष्ट्र और विश्व को बचाने की पहल की ओर कदम बढ़ाते हुए।मुँह छिपाने वाली आदत को छोड़ समाजिक मानवीय मूल्यों की रक्षा की ओर कदम बढ़ाये । 

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